Thursday, 20 April 2023
राशन कार्ड से वंचित 8 करोड़ प्रवासी श्रमिकों को कार्ड मुहैया कराने के सुप्रीम कोर्ट ने दिये निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार, 20 अप्रैल, 2023 को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को ईश्रम पोर्टल में पंजीकृत लगभग आठ करोड़ प्रवासी श्रमिकों को राशन कार्ड प्रदान करने का निर्देश दिया, लेकिन राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत कवर नहीं किया गया।पोर्टल में 28.6 करोड़ पंजीकृत हैं। लेकिन इसमें से 20.63 करोड़ ही
राशन कार्ड के आंकड़ों पर दर्ज हैं।"इसका मतलब है कि ईश्रम पोर्टल पर बाकी पंजीकरणकर्ता अभी भी राशन कार्ड के बिना हैं ... बिना राशन कार्ड के एक प्रवासी / असंगठित मजदूर या उसके परिवार के सदस्य योजनाओं के लाभ और यहां तक कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत लाभ से वंचित हो सकते हैं," न्यायमूर्ति एम.आर. शाह की अगुवाई वाली खंडपीठ ने कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज, हर्ष मंदर और जगदीप छोकर द्वारा दायर याचिका पर अपने आदेश में उल्लेख किया।
याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता प्रशांत भूषण और चेरिल डिसूजा ने तर्क दिया था कि खाद्य सुरक्षा अधिनियम की सुरक्षात्मक छतरी के बाहर 10 करोड़ से अधिक श्रमिक हो सकते हैं क्योंकि आंकड़े 2011 की जनगणना पर आधारित थे। तभी से आबादी बढ़ी होगी।
अदालत ने कहा कि कल्याणकारी राज्य का यह कर्तव्य है कि वह प्रत्येक प्रवासी श्रमिक को राशन कार्ड रोल में शीघ्रता से शामिल करे।
इसने अधिकारियों को अपने आदेश को लागू करने के लिए तीन महीने का समय दिया। इसने सुनवाई की अगली तारीख 3 अक्टूबर तक केंद्र से स्थिति रिपोर्ट मांगी है।
अदालत ने आदेश दिया, "हम राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को ई-श्रम पोर्टल पर छूटे हुए पंजीकरणकर्ताओं को राशन कार्ड जारी करने की कवायद के लिए व्यापक प्रचार-प्रसार करने के लिए तीन महीने का समय देते हैं।"
खंडपीठ ने कहा कि राज्य और केंद्र शासित प्रदेश जिला कलेक्टरों के माध्यम से श्रमिकों तक पहुंच सकते हैं "ताकि ईश्रम पोर्टल पर अधिक से अधिक पंजीकरण कराने वालों को राशन कार्ड जारी किए जा सकें और उन्हें केंद्र सरकार और राज्य सरकारों द्वारा शुरू की गई कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिल सके।" , राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत लाभ सहित ”।
Monday, 10 April 2023
स्कूली छात्राओं को मुफ्त सैनिटरी पैड देने होंगे, 4 हफ्तों में नीति बनाये केंद्र सरकार:सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली : देशभर के स्कूलों में छह से 12वीं कक्षा में पढ़ने वाली लड़कियों को मुफ्त सैनिटरी पैड मुहैया कराने का निर्देश देने की याचिका पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को चार हफ्ते में यूनिफार्म पॉलिसी बनाने के निर्देश दिए. कोर्ट ने कहा कि ये महत्वपूर्ण मामला है. केंद्र सरकार को राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों को भी शामिल करने को कहा है.
स्वास्थ्य और परिवार मामलों के मंत्रालय में सचिव राज्य सरकारों के साथ बातचीत करने के लिए नोडल अधिकारी होंगे. केंद्र तीन महीने में दाखिल करेगा अपडेट स्टेटस रिपोर्ट. सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से अतिरिक्त सोलिसिटर जनरल
ऐश्वर्या भाटी ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह युवा और किशोर लड़कियों के लिए मासिक धर्म स्वच्छता तक पहुंच में सुधार करने के लिए समर्पित है. लेकिन स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने की जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकारों की है, क्योंकि सार्वजनिक स्वास्थ्य राज्य का विषय है.Tuesday, 4 April 2023
सरकार की आलोचना किसी मीडिया/चैनल का लाइसेंस रद्द करने का आधार नहीं हो सकती:सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली : मलयालम समाचार चैनल मीडियावन (MediaOne) को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है. मीडियावन चैनल को सुरक्षा मंजूरी के अभाव में प्रसारण लाइसेंस को नवीनीकृत करने से इनकार करने के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के आदेश को सुप्रीम ने खारिज कर दिया है. दरअसल मीडियावन चैनल को गृह मंत्रालय द्वारा सुरक्षा मंजूरी नहीं मिलने की वजह से केंद्र सरकार ने उसके प्रसारण लाइसेंस का नवीनीकृत करने से इंकार कर दिया था. जिस को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी.
CJI की अध्यक्षता वाली बेंच ने आज इस मामले पर अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि एक मजबूत लोकतंत्र के लिए एक स्वतंत्र प्रेस आवश्यक है. सरकार की नीतियों की आलोचना व अभिव्यक्ति की आजादी को प्रतिबंधित करने का आधार नहीं हो सकता. प्रेस की सोचने की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता है. किसी मीडिया संगठन के आलोचनात्मक विचारों को प्रतिष्ठान विरोधी नहीं कहा जा सकता है. जब ऐसी रिपोर्ट लोगों और संस्थाओं के अधिकारों को प्रभावित करती हैं, तो केंद्र जांच रिपोर्ट के खिलाफ पूर्ण छूट का दावा नहीं कर सकता है. लोगों को उनके अधिकारों से वंचित करने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा को उठाया नहीं जा सकता.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मीडिया का कर्तव्य है कि वह सत्ता से सवाल पूछे और नागरिकों को हार्ड फैक्ट्स (वस्तुस्थिति) से अवगत कराए. CJI डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली SC बेंच ने यह भी कहा कि सरकार को यह स्टैंड लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती है कि प्रेस को सरकार का समर्थन करना चाहिए. सरकार की आलोचना किसी मीडिया/टीवी चैनल का लाइसेंस रद्द करने का आधार नहीं हो सकती. अदालत के समक्ष कार्यवाही में अन्य पक्षों को जानकारी का खुलासा करने के लिए सरकार को पूरी तरह से छूट नहीं दी जा सकती है. सभी जांच रिपोर्टों को गुप्त नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ये नागरिकों के अधिकारों और स्वतंत्रता को प्रभावित करती हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि केवल 'राष्ट्रीय सुरक्षा' का आह्वान करके सभी सामग्री को गुप्त नहीं बनाया जा सकता है. अदालतें एक दस्तावेज़ से संवेदनशील हिस्सों को हटा सकती है और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का पालन करने के लिए न्यायिक कार्यवाही के दौरान इसे दूसरे पक्ष को बता सकती हैं. मीडिया द्वारा सरकार की नीतियों की आलोचना को राष्ट्रविरोधी नहीं करार दिया जा सकता है. मीडिया की ज़िम्मेदारी बनती है कि वो सच को सामने रखें. लोकतंत्र मज़बूत रहे, इसके लिए मीडिया का स्वतंत्र रहना जरूरी है. उससे ये उम्मीद नहीं की जाती है कि वो सिर्फ सरकार का पक्ष रखें. मीडिया वन चैनल पर प्रतिबंध के केंद्र के फैसले को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट
ने ये टिप्पणी की है.